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मुक्तक

मुक्तक

सोने चाँदी की महफिल थी ,मैं मुफलिस बेचारा था भटक रहा था प्रेम गली में ,दिल ऐसा आवारा था प्रीति का दीप बुझाकर उसने ,रौशन किया उजालों को ...
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मुक्तक

मुक्तक

कुछ  तो मालामाल हुये और  कुछ की जेबें खाली थीं कुछ की रौशन रात हुई और कुछ की रातें काली थीं फुलझडियों की राख मिली ,कुछ हारे हुये जुआरी ...
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